अलविदा बीते कुछ सालो को
अलविदा बीते कुछ सालो को
Bye Bye Few Years
बाय बाय सिर्फ इस साल को नहीं बाय बाय उन सारे सालों को जो अब तक मैं बिता चुका हूं अलविदा सिर्फ बीते साल के लिए ही नहीं बल्कि उन सालों के लिए जो हमने देखे है शायद आगे आने वाली पीढ़ी वो लम्हा ही महसूस ना कर पाए मेरा मानना है कि , दुनिया में जितना बदलाव हमारी पीढ़ी ने देखा है, हमारे बाद की किसी पीढ़ी को शायद ही इतने बदलाव देख पाना संभव हो।
हम वो आखिरी पीढ़ी हैं जिसने बैलगाड़ी से लेकर सुपर सोनिका जेट देखे हैं। बैरंग ख़त से लेकर लाइव चैटिंग तक देखा है , वर्चुअल मीटिंग जैसी असंभव लगने वाली बहुत सी बातों को सम्भव होते हुए देखा है।
मेरा धन्यवाद है उस साल के लिए जिसने कि मुझे यह सिखाया शादी में 50 लोगों से भी रस्मे निभाय जा सकती है कोई जरूरत नहीं है एक लड़की के पिता के ऊपर पैसों का बोझ डालने और झूठा दिखावा करने का
हम वो पीढ़ी हैं जिन्होंने कई कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर , परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं हैं। जमीन पर बैठकर खाना खाया है। प्लेट में डाल डाल कर चाय पी है जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल,
धन्यवाद है उस साल का जिसने हमें सिखाया कि गांव के अंदर हमारे सभी बुजुर्ग लोग अपने पास एक गमछा क्यों रखते थे और उस गमछा की कीमत हमने इस साल में सीखी क्यों गमछा हमें कितनी बड़ी बीमारी से बचा सकता है
हम वो लोग हैं जिन्होंने चांदनी रात , लालटेन , या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है। और दिन के उजाले में चादर के अंदर छिपा कर नावेल पढ़े हैं। जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों से दिए हैं। उन ख़तो के पहुंचने और जवाब आने में महीनों तक इंतजार किया है।
फिर से एक बार धन्यवाद है उस साल को जिस ने बताया कि दिन में दो समय खाना और एक बरमूडा और टीशर्ट पहनकर आप अपना जीवन बड़े आराम से गुजार सकते हैं जिस ने सिखाया की पैसों से ज्यादा स्वास्थ्य की अहमियत होती है निरोगी काया सबसे बड़ा धन है
हम वो आखरी लोग हैं जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे। जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है।
धन्यवाद है मेरा उस साल को जिसने यह बताया कि परिवार क्या होता है जो लोग सालों से अपने परिवार से दूर थे उन्होंने 2 महीने पूरे अपने परिवार वालों के साथ बिताए और उन्होंने महसूस किया कि दुनिया में परिवार से बड़ी कोई चीज नहीं है
जिन्होंने स्याही वाली पेन से कॉपी, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है। और घर में शिकायत करने पर फिर मार खाई है।
फिर एक बार फिर कहता हूं उस साल के लिए जिसने हमें इतनी साफ-सफाई से रहना सिखा दिया जिसने सिखा दिया कि दिन में कितनी बार हाथ धोने हैं और कैसे धोने हैं
हम वो आखरी लोग हैं जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को दूर से देख कर, नुक्कड़ से भाग कर, घर आ जाया करते थे। और समाज के बड़े बूढों की इज़्ज़त डरने की हद तक करते थे। जिन्होंने गोदरेज सोप की गोल डिबिया से साबुन लगाकर शेव बनाई है। जिन्होंने गुड़ की चाय पी है। सुबह काला लाल दंत मंजन या लकड़ी के कोयले से दांत साफ किए हैं।
हम निश्चित ही वो लोग हैं ?जिन्होंने चांदनी रातों में, रेडियो पर BBCकी ख़बरें, विविध भारती, बिनाका गीत माला और हवा महल जैसे प्रोग्राम पूरी शिद्दत से सुने हैं।
धन्यवाद है फिर उस साल का जिसने अपने बरसों से गए हुए लोगों को अपने गांव में बुलाया है और फिर से छत के ऊपर चांदनी रात में सोने का मौका दिया है
जब हम सब शाम होते ही छत पर पानी का छिड़काव किया करते थे। एक स्टैंड वाला पंखा सब को हवा के लिए हुआ करता था। सुबह सूरज निकलने के बाद भी सोते रहते थे। वो सब दौर बीत गया। चादरें अब नहीं बिछा करतीं। डब्बों जैसे कमरों में कूलर, एसी के सामने रात होती है, दिन गुज़रते हैं।
हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं जिन्होने वो खूबसूरत रिश्ते और उनकी मिठास बांटने वाले लोग देखे हैं, अब तो लोग जितना पढ़ लिख रहे हैं, उतना ही खुदगर्ज़ी, और अकेलेपन में खोते जा रहे हैं।
हम इस दुनिया के वो लोग भी हैं , जिन्होंने एक ऐसा अविश्वसनीय सा लगने वाला नजारा देखा है ?
आज के इस करोना काल में पति-पत्नी , बाप - बेटा ,भाई - बहन को भी एक दूसरे को छूने से डरते हुए भी देखा है। पारिवारिक रिश्तेदारों की तो बात ही क्या करे , खुद आदमी को अपने ही हाथ से , अपनी ही नाक और मुंह को , छूने से डरते हुए भी देखा है।
अर्थी को बिना चार कंधों के , श्मशान घाट पर जाते हुए भी देखा है।
पार्थिव शरीर को दूर से ही अग्नि दाग लगाते हुए भी देखा है।
हम आज के भारत की एकमात्र वह पीढी है ? जिसने अपने माँ-बाप की बात भी मानी , और अपने से छोटे की भी मान रहे है।
अभी घर से बाहर निकले तो हमेशा याद रखें
दो गज दूरी और मास्क है जरूरी
