मुर्गे की बांग
मुर्गे की बांग
बिना बिचारे जो करे सो पीछे पछताए
यह कहानी उस समय की है जब घड़ी का आविष्कार नहीं हुआ था मुर्गे की बांग से ही सुबह का पता चलता था एक बुढि़या थी। उसका जीवन यापन अपने छोटे से खेत के अंदर सब्जियां उगा कर और बेचने से होता था
उसके यहाँ दो नौकर थे। बुढि़या रोज सुबह मुर्गे की बांग देते ही उठ जाती थी। फिर वह अपने नौकरौ को जगाती और उन्हे काम पर लगा देती। नौकरो को सुबह इतनी जल्दी उठना पसंद नही था। वे दोनो हमेशा यही सोचा करते ऐसा कोई उपाय करना चाहिये। ताकि हम आराम से सो सके।
एक दिन एक नौकर ने कहा, क्यो न हम सभी मुर्गो को मार डाले। न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी यदि मालकिन सुबह मुर्गे की बांग नही सुनेगी तो जल्दी उठेगी कैसे। यदि वह सुबह जल्दी जाँगेगी नही तो हमें नींद से कौन उठाएगा | फिर हम चैन कीनीद सो सकेगे।
दूसरे नौकर को यह बात पसंद आ गई। दूसरे दिन दोनो नौकरो ने मिलकर मुर्गे को मार डाला। जब मुर्गा ही नही रहा तो बड़े सबेरे बाँग कौन देता? अब बुढि़या को सुबह उठने का समय नही पता चलता था।
इसलिए वह पहले की अपेक्षा और जल्दी उठ जाती थी। एक बार वह जग जाती तो नौकरो को भी सोने न देती। मुर्गा तो मर गया पर नौकरो की परेशानी पहले से ज्यादा बढ़ गई।अब उन्हे और भी जल्दी उठना पडता था।
इसलिए किसी ने सच ही कहा है बिना बिचारे जो करे सो पीछे पछताए।
मनुष्य किसी भी कार्य को करने से पहले कुछ भी नहीं सोचता है व उस कार्य को पहचानता नहीं है और उसे कर ही देता है. फिर उसे अपनी गलती का एहसास होने लगता है तो वह उस समय पछताता हैं.
अब पछताए क्या होत जब चिड़ियाँ चुग गई खेत. मनुष्य को अपने किसी कार्य को करने से पूर्व सोच समझकर ही निर्णय लेना चाहिए ताकि उसे बाद में पछताना न पड़े.
परन्तु कई मनुष्य बहुत आलसी होते है जो कार्य करने से पहले अपनी बुद्धि का बिलकुल भी उपयोग नहीं करते हैऔर दूसरों के कहने पर बिना सोचे समझे लोगों की बातो में आकर उस मुर्गा को मर देते है
